Monday, November 30, 2015
Tuesday, November 24, 2015
महफूज़
आज आतंक का कोहरा छाया है
हर तरफ दिलो में भड़कती ज्वाला है
जिनमे न वे अपना अस्तित्व बचाते है
परन्तु अन्यों को भी मिटाते है
अब रहा न किसी कोने में कोई महफूज़ |
आज आतंक की जड़े चारो ओर सुलगी है
जिसमे पीड़ित हो कई माये अपने बच्चो के लिए रोई है
आँखों में दर्द और डर समाया है
प्रेम का भाव मनुष्य कही दफ़ना आया है
अब रहा न किसी कोने में कोई महफूज़ |
हर तरफ लाचारी, बेबसी ने हाथ बढ़ाया है
आतंकवाद ने अपना झंडा फहराया है
हर तरफ आग की लपते है
अब तो पेड़ के तले भी ना छाया है
अब रहा न किसी कोने में कोई महफूज़ |
हाय रे, अब भी समय है
इए समस्या से लड़ना होगा
और इस पर विजय पा इसे जड़ करना होगा
अरे! देखो कही देर न हो
यह घुल न जाये पूरे विश्व में विष की तरह
इससे पहले ही कुछ कर गुज़रना होगा
इस आतंकवाद को हमें मिलकर मिटाना होगा
जिसके कारण रहा न किसी कोने में कोई महफूज़ |
Monday, November 16, 2015
Sunday, November 15, 2015
Dance Floor
ना जाने क्या मज़ा है
Dance Floor की रंग बिरंगी जलती -बुझती लायटो में
लोग एक लय में थिरकने लगे
खुद में मस्त हो कुछ बहकने लगे
DJ ने किया म्यूज़िक लाउड
हॉल मे अपने आप बढ़ गया क्राउड
कुछ दीवाने अपने हर move पे हो रहे थे proud
तो कुछ यूँ ही झूमते थे, जैसे आसमान मे mad cloud
जहा सब नाचने में है खोए
वही कुछ चेयर पे बैठे करते अपने head को Shake
इसमे किसी की कोई नही Mistake
ये है Dance Floor
ये नही करता किसी को bore
Friday, October 16, 2015
नफ़रत की दीवार
और एक तेरा पक्ष है
नफ़रत की इस दीवार पर साथी एक पैगाम
तू भी लिख
ये बतला, कब लोगो से परे गोलियाँ तेरी दोस्त बन गयी
ये कैसा रोष
हुई तेरी चेतना बेहोश
आँखे मूंदकर बस गोली चला दी
कभी ये सोचा उसके पीछे भी कोई रोता होगा
किसी की पत्नी को बेवा और
बच्चों को यतीम करते समय
तेरे हाथ कभी नही कापते
चिखते गिड़गिदते लोगो का ख़ौफ़ देख
शायद हृदय के किसी कोने मे द्वंद भी तो होता होगा
तेरी जिंदगी के मायने क्या खून ख़राबा है
तो ये जिंदगी, जिंदगी नही छलावा है
दिन भर की दहसदगीर्दी के बाद
रात मे क्या सपने लेकर सोता होगा
नफ़रत की इस दीवार पर साथी
अपना पैगाम तू भी लिख.
Monday, July 13, 2015
तुम याद बहुत आओगे
चले गए दूर तुम अब
लौट के न आओगे
फिर भी तुम हमें बड़ा रुलाओगे'
और तुम याद बहुत आओगे
हमारे बीच फ़ासले है, दरमियाँ है
फिर भी हम दोनों के दिलो में
तुम जितना भी दूर जाओगे
फिर भी तुम याद बहुत आओगे
अब न जाने कब किस मोड़ पर मिलना हो
तब तुम्हारा बदला स्वरुप देख पछताएंगे
पर ये सोच हम अपने दिल समझाएंगे
की कही न कही हम भी बदले है
इस बदलाव में दोनों का दोष है
क्योंकि समय की गति बलवान होती है
अब बस मुझे तुम ख्वाबो में
याद बहुत आओगे
लौट के न आओगे
फिर भी तुम हमें बड़ा रुलाओगे'
और तुम याद बहुत आओगे
हमारे बीच फ़ासले है, दरमियाँ है
फिर भी हम दोनों के दिलो में
तुम जितना भी दूर जाओगे
फिर भी तुम याद बहुत आओगे
अब न जाने कब किस मोड़ पर मिलना हो
तब तुम्हारा बदला स्वरुप देख पछताएंगे
पर ये सोच हम अपने दिल समझाएंगे
की कही न कही हम भी बदले है
इस बदलाव में दोनों का दोष है
क्योंकि समय की गति बलवान होती है
अब बस मुझे तुम ख्वाबो में
याद बहुत आओगे
Sunday, July 5, 2015
" क्या ह्म सही माईने में दिवाली है मानते ?"
हम पूछेंगे जब क्या है दिवाली
हम क्यों है इसे मानते
लोग कहेंगे उस दिन बम, अनार, चकरी, रौकेट, फटके, फुलझरी है जलाते
पर सत्य पर असत्य की विजय हुई थी ये वह नहीं जानते
इस दिन तम को प्रकाश ने हरा था ये इतना नहीं समझते
क्या ये सही माईने में दिवाली है मानते ?
इस दिन नए कपडे, मिठाई, पकवान, फटाके भर- भर है लाते
पर एक नाय विचार भी तो नहीं अपनाते
संपन्न को ढ़ेरो मिठाइयाँ है बाँटते
पर द्वार पर खड़े भूखे- नंगो को है धुत्काराते
क्या ह्म सही माईने में दिवाली है मानते ?"
अगर फटाके जलना है दिवाली
तो आपको ये मानना होगा
हम केवल छोटी दिवाली को है जानते
और आतंकवादी घातक बमों के गोलों के दम पर बड़ी दिवाली है मानते
खाने- पिने का टोटारहता है घर में
पर फिर भी अपनी संजोयी संपत्ति को जुए में है उड़ाते
क्या ह्म सही माईने में दिवाली है मानते ?
वो भूली बिसरी बाते
जब नानी-दादी अपने पोता-पोती को कहानी थी सुनती
पर अब वह खुद अंधियारी कुटिया में दुबक कर रह जाती
व्यर्थ है दिवाली का मानना
जब तुमने इसका अर्थ न जाना
हम हर साल दिवाली का इंतज़ार है करते
पर क्या ह्म सही माईने में दिवाली है मानते ?
लो फिर आई दिवाली
जगमग हुआ सारा जग
मीठे पकवान सब मिलकर है बनाते
पर चलो इस बार इसे अपने लिए नहीं औरों के लिए बनाये
अंधियारी गलियों में खुशियों का दीप जलाये
चलो सही माईने में दिवाली मनाये!!
तो आपको ये मानना होगा
हम केवल छोटी दिवाली को है जानते
और आतंकवादी घातक बमों के गोलों के दम पर बड़ी दिवाली है मानते
खाने- पिने का टोटारहता है घर में
पर फिर भी अपनी संजोयी संपत्ति को जुए में है उड़ाते
क्या ह्म सही माईने में दिवाली है मानते ?
वो भूली बिसरी बाते
जब नानी-दादी अपने पोता-पोती को कहानी थी सुनती
पर अब वह खुद अंधियारी कुटिया में दुबक कर रह जाती
व्यर्थ है दिवाली का मानना
जब तुमने इसका अर्थ न जाना
हम हर साल दिवाली का इंतज़ार है करते
पर क्या ह्म सही माईने में दिवाली है मानते ?
लो फिर आई दिवाली
जगमग हुआ सारा जग
मीठे पकवान सब मिलकर है बनाते
पर चलो इस बार इसे अपने लिए नहीं औरों के लिए बनाये
अंधियारी गलियों में खुशियों का दीप जलाये
चलो सही माईने में दिवाली मनाये!!
Sunday, June 21, 2015
ग़ज़ल
जो लौट कर गये थे
कहकर की आनेवाले है
फिर पलटकर क्यों देखा भी नहीं
हमने उसको टोका नहीं
उसने ख़ुद को रोका नहीं
और तकदीर ने दिया, कोई मौका भी नहीं
इंतज़ार जो मेरा नसीब बन गया है
उसे इसकी खबर भी नहीं
कर दिया रुसवा भरे बाज़ार में, बस तेरे इनकार ने
जाने क्यों अब इतनी बेमुर्रवत हो गयी है जिंदगी
कभी देखी थी जन्नत, पर अब मिलन ख़यालो में भी नहीं
Saturday, June 13, 2015
बारिश का मौसम
जब भी नभ में बादल घिरते है
तब नभ से शीतल नीर बरसते है
मेघ गरज- गरज कर हमें संगीत सुनते है
ये अपनी गरिमा से हमें लुभाते है
नन्हीं -नन्हीं बूंदे धरती पर गिरती है
मन को सौंधी खुसबू से भरती है
हर तरफ खुशी की लहरे है छायी
किसान बारिश के आगे नत मस्तक हो जाते है
सुख से अपनी बींजो को उपजाते है
चाक की श्रुधा और प्यास जाएगी
देखा अब हरियाली कालीन धरा पर बिछ जाएगी
वन में मयूर पर फैलाये नृत्य करने लगे है
बच्चे भी पानी में हिलोर, उछल-कूद करने लगे है
इस बारिश की बौछार में करे गरम चाय की प्याली
सब के चेहरों पर खिल उठे लाली
अब रहे न कोई गम
लो आया बारिश का मौसम
Friday, June 5, 2015
नर्तकी अब नाच कर ले
नर्तकी अब नाच कर ले
बैठे चारो ओर तेरे घर को घेरे
मैं भी आया द्वार तेरे
मैं भी आया द्वार तेरे
अपने घर से मुँह फेरे
नर्तकी अब नाच कर ले
नर्तकी तेरा नाच देखा
लोंगो ने तेरे लिए कितना पैसा फेंका
लेकिन मैं तुझे क्या दूँ, क्योंकि मैं अकेला
मेरे संग यहाँ मेरा न साथी न कोई चेला
नर्तकी अब नाच कर ले
लोग कहते है द्वार तेरे कभी न जाना
बदनाम होगा जिसने ये कहना न माना
पर तेरे द्वार आकर मैंने कितना सुकून पाया
कितनी गजब की है माया
फिर मैंने सोचा
सच में तेरा जीवन है क्या
तू गाती दुसरो के लिए है
नाचती किसी और के लिए है
सुख देती है दुसरो को
और स्वयं आंसुओ के घूंट पीती
तेरा क्या
फिर भी बदनाम रहती तू
नर्तकी फिर भी नाच कर ले तू
Monday, May 25, 2015
Saturday, May 23, 2015
अंडरवर्ल्ड डॉन और पुलिस
Underworld, Don, भाई, गुंडे, Terrorist, Naxalite सच में एक दयनीय जीवन जीते है। उनके पास पैसा खूब होता हैं, पर आज़ादी छिन जाती हैं। छुप - छुप कर जीना पड़ता है। मार काट तो जीवन का हिस्सा बन जाता है। वे हज़ारो निहत्थे आम आदमी को बिना किसी कसूर मौत की नींद सुला देते है। यही मार काट उनकी शक्ति का परिचायक बन जाता है। मरते समय वे लोंगो की आँखों में ख़ौफ़, आँसू और डर देख कर प्रसन्न होते है, उन्हें मज़ा आता है। डराना-धमकाना तो उनका आम कार्य है। इस क्षेत्र में यदि कोई कच्चे दिलवाला आ जाये तो वह उसी के बीच पीस कर रह जाता है। रोज़-रोज़ खून की नदियों को देखते -देखते एक दिन न जाने कब उसका खून भी बह जाता हैं । उनकी मृत्यु कब, कहाँ, कैसे हो जाये उन्हें नहीं पता। पर इतना ज़रूर पता है उन्हें मारना ज़रूर है। पुलिस की गोली से या अपने ही किसी भाई के हाथ से। इन सब लोंगो में यह बात सामान पायी जाती है की वैसे वे ख़ुशी से हज़ारों को गोली से उड़ा देते है और तब भी उनकी आँखों में कोई खौफ, डर या दर्द नहीं होता पर अपनी मृत्यु के समय उन्हें नाना प्रकार के डर, परिवार की याद, गलती का एहसास हो जाता है। तब वही व्यक्ति जो किसी की लाइफ की कोई कद्र नहीं करता है जिसके हांथो से हज़ारों की जिंदगी होती है (आज) एकाएक अपनी मृत्यु आने पर ज़िन्दगी की भीख मांगता है। पर आखिर में इन्हे पुलिस अपनी गोली का निशाना बना लेती है । जिसे वे encounter का नाम देते है । उनके शव का ना अंतिम संस्कार होता है ना वो दफनाए जाते है । जिनके बाद ना उनके नाम सुनाई देते है ना काम। इस मामले में पूरा दोष इनको देना गलत है। पुलिस को एनकाउंटर के अलावा कोई अलग रास्ते इख़्तियार करने चाहिए जिससे वे इन्हे पकड़ सके और सुधार सके, क्योंकि एनकाउंटर एक अप्रिय घटना है। इसमें कई बार आम इंसान भी शिकार हो जाया करते है।पर पुलिस करे तो क्या करे। ऐसे लोग समझने से समझते भी तो नहीं। उनका दिल नहीं, दिमाग नहीं, सिर्फ उनकी गोली बोलती है। उनके भाव नहीं होते बस पिस्तौल चलती है। उनमे देश प्रेम की भावना नहीं केवल पैसा बोलता है। पैसे की खातिर वो देश को भी बेंच देते है। ऐसे लोगों को क्या एक मौका भी दें उचित होगा ? ....
पर मनुष्य को कब और किसने ये अधिकार दे दिया की वह ईश्वर के रूपों को यूहीं मौत की घाट उतार देना, यूहीं उनकी जान लेले। जितनी निर्दय, क्रूरता से ये डॉन, भाई लोग मारते है। उनसे भी दो हाँथ ऊपर होती है पुलिस। जो उन्ही को उससे भी अधिक निर्दयता से गोली मार देते है। ये गोली के शहंशाह पुलिस की ही गोली खाकर अपना दम तोड़ देते है। अब आप समझ ही रहे है। हिंसा से किसी का भी कभी भला नहीं हो सकता है। यदि आप हिंसा से कुछ प्राप्त करते तो हिंसा ही उसे डूबा ले जाती है। गांधीजी भी इसे भली भांति जानते थे इसलिए तो उन्होंने अहिंसा का साथ दिया और तभी तो उन्हें कोई आपने लक्ष्य को पाने से रोक न सका और हम अब आज तक स्वतंत्र है और रहेंगे।
Tuesday, April 28, 2015
काश दिल में यादें लिखने वाली पेंसिल का भी कोई रबर होता
काश दिल में यादें लिखने वाली
पेंसिल का भी कोई रबर होता
वक़्त बेवक़्त आती यादो को रोक पाती
मेरे दिल का दरवाज़ा अक्सर खुलता बंद होता रहता है
कभी दिनों में, कभी घण्टों में, तो कभी पलो में
रह रह कर दस्तक दे जाती है
ये वक़्त और जगह नहीं देखती है
बेवक़्त ही सताती है
कभी तो तन्हा भी छोड़ जाती हैं
सच में, इसे बहला पाना आंसा नहीं
इसलिए सोचती हुँ
काश दिल में यादें लिखने वाली
पेंसिल का भी कोई रबर होता
Tuesday, April 21, 2015
Sunday, April 19, 2015
एक छोटी सी खिड़की से कितनी दुनिया देख चूका
मैं तीसरे माले पर रहता हूँ
अपने में कुछ खोया- खोया
सब से बेखबर
अपनी छोटी सी चार दिवारी में बंद दुनिया
घर में एक छोटी सी खिड़की है
जो मुझे दूसरों से कभी कबार जोड़ देती है
बैठे- बैठे वहाँ से आते जाते लोगों को देखा करता हूँ
उनकी हँसी में अपनी हँसी खोजा करता हूँ
नाख़ून चबाता जब सामने से कोई निकले
मेरा दिल ! क्या हुआ ये जानने मन मचले
रुआँसा सा जब कोई दबे पाँव चला जाता है
मेरी जिज्ञासा भी बढ़ा जाता है
सोचता हूँ, पूंछूं क्या हुआ ?
पर तहज़ीब का दायरा याद आ जाता हैं
बॉल लिए जब कोई अपनी धुन में चला जाता हैं
कभी गेंद आकाश में उछाले, तो कभी ज़मीन पर
कभी उँगलियों पर रखकर करतब दिखाता
उसे देख मझे मेरा बचपन याद आता
सर्दी के मौसम में, मैं कोट पे कोट डाले बैठता हूँ
तो खिड़की के बाहर बिखारी को मैं नंगे बदन सुकड़ता सा पता हूँ
तब अपने शरीर पर स्वेटर और ओवरकोट के अंदर भी
शरीर पर उठे काँटों के अहसास से सिहर सा जाता हूँ
जब चार कंधे शव को गली से ले जाते
तो उसके परिजन का शोक देख मेरे आँखों में आँसूं छलक आते
मैं इस खिड़की पर लटका देखता हूँ हज़ारों नज़रें
हज़ारों चेहरे, कोई नाचता, कोई गाता, कोई रोता और कोई मुस्कुराता
कितनी अलग है ये दुनियाँ
खिड़की के अन्दर एक दुनियाँ
खिड़की के बाहर अनेकों दुनियाँ
Saturday, April 18, 2015
Tuesday, April 14, 2015
Short Cut
शॉर्टकट
साधारण मार्ग से सब है अंजान
रहती है शॉर्टकट की सबको तलास
Cheating कर exam में आते है first
Practical result हो जाता है worst
शॉर्टकट के प्रचलन ने लाई जीवन में कितनी complications
अब SMS का ज़माना है
तो briefing को हमें निभाना है
अब शॉर्टकट सर चढ़कर बोल रहा है
पिताजी को अब पा सारी दुनिया बोल रहा है
जब बच्चे ने एक important बात का जिक्र बाप से करना चाहा
पिता बोले "flight का time हो रहा है
ज़रा शार्ट में बताना "
बेटा बोला, ठीक है ज़रा 4000 का नोट तो पकड़ना
पिता ने कहा how rude
बेटा बोला Daddy I was going according to your mood
कल मेरा जन्मदिन है दोस्तों को पार्टी है देनी
बाप बोला मिल जाएंगे, ऐसे पहले क्यों नहीं बताया
पर Daddy मैंने तो बस आपका समय बचाया
आखिर क्यों?
कुछ पल के परिश्रम से घबराकर
लोग शॉर्टकट को अपनाते है
देखो स्वयं ही मुसीबत से घिर जाते है
शार्टकट सारी अच्छी बातों को करता है कट
फिर भी सब बोले
Long route ही क्यों
"Lets take the shortcut"
साधारण मार्ग से सब है अंजान
रहती है शॉर्टकट की सबको तलासCheating कर exam में आते है first
Practical result हो जाता है worst
शॉर्टकट के प्रचलन ने लाई जीवन में कितनी complications
अब SMS का ज़माना है
तो briefing को हमें निभाना है
अब शॉर्टकट सर चढ़कर बोल रहा है
पिताजी को अब पा सारी दुनिया बोल रहा है
जब बच्चे ने एक important बात का जिक्र बाप से करना चाहा
पिता बोले "flight का time हो रहा है
ज़रा शार्ट में बताना "
बेटा बोला, ठीक है ज़रा 4000 का नोट तो पकड़ना
पिता ने कहा how rude
बेटा बोला Daddy I was going according to your mood
कल मेरा जन्मदिन है दोस्तों को पार्टी है देनी
बाप बोला मिल जाएंगे, ऐसे पहले क्यों नहीं बताया
पर Daddy मैंने तो बस आपका समय बचाया
आखिर क्यों?
कुछ पल के परिश्रम से घबराकर
लोग शॉर्टकट को अपनाते है
देखो स्वयं ही मुसीबत से घिर जाते है
शार्टकट सारी अच्छी बातों को करता है कट
फिर भी सब बोले
Long route ही क्यों
"Lets take the shortcut"
Sunday, April 5, 2015
Ghazal

माना की मसले बहुत है दुनिया में
और ये रिस्ते भी कम संजीदा ऩही
पर क्या ज़िंदगी अब इतनी भी मयस्सर नहीं
की सुकून के कुछ लम्हे गुज़ार ले...
सुना है, ग़मों से रूबरू होते ही
शकशियत में और निखार आ जाता है
लो ये भी कर लिया
पर अब भी कुछ नहीं बदला
न फ़ज़ाए बदली
ना ये नज़ारे बदले
गीले भी है, शिकवे भी है
और खड़े सब मसले भी है
शायद ये ही ज़िन्दगी है और शायद नहीं भी है
Saturday, March 28, 2015
खोई सी उम्मीद
आज मेहनत नहीं नसीब की बात करता है आदमी
अपनों की नहीं सिर्फ अपनी बात करता है आदमी
अब विचार संकीर्ण होते जा रहे है
मुर्दा घर में भी बड़े शान से चलता है आदमी
ईमानदारी ने जैसे आँख मूँद ली हो
बेशर्मी का नंगा नाच दिखा रहा है आदमी
आज डर का माहौल सजा है
हर तरफ़ बमो और विस्फोटो का चर्चा छिड़ा है
कुछ को ये विनाश छूकर गया है
तो कइयों का चिथड़ा पड़ा है
आज ईश्वर को मन नहीं मंदिरो में खोजा जाता है
जब अन्याय से लड़ने को कोई अकेला खड़ा आवाज़ लगता है
तब दूसरा उससे कुछ कदम दूर चला जाता है
और न्याय भी चादर ओढ़ मीठी नींद सो जाता है
क्या ये सुन्दर गुलस्ता बिखर जाएगा
या कोई इसकी सुरक्षा का भार उठाएगा
शिकायत तो हम तुम हर पल किया करते है
चलो उम्मीद की ज्योत जलाए
एक कदम तुम चलो तो एक कदम हम चलते है
Thursday, March 26, 2015
खुदगर्ज़ ज़माना
खुदगर्ज़ ज़माना
इस खुदगर्ज़ ज़माने का साथ हम निभाए कैसे?
छुप बैठा है भेड़ की खाल में भेड़िया
उसे अब हम पहचाने कैसे?
सब को खुला मैदान चाहिए, घर नहीं माकान चाहिए
कोई स्वछंद परिंदा पर फैलाए तोह कैसे?
इस खुदगर्ज़ ज़माने का साथ हम निभाए कैसे?
घड़ी की नोक पर भागता है आदमी
कुछ बात करनी थी, पल भर के लिए उसे ठहराए कैसे?
क्रोध भरा है भीतर, पर प्यार से इन्हें समझाए कैसे?
लहू अब जम सा गया है
वक्त भी थम सा गया है
जहाँ ज़िंदगी से है मौत सस्ती
डराती है ये वीरान बस्ती
सोए हुए इस आदमी को अब जगाये कैसे?
घुटन की इस ज़ंजीर से बाहर खुद को निकाले कैसे?
ये कहने को तो कहता जाता है
भाषण, नारेबाजी तोह कही आर्टिकल छपवाता है
कहने से परे, कहने की पहलकदमी कोई नहीं करता
वो पहल, वो शुरूआत कोई करे तो कैसे ?
इस खुदगर्ज़ ज़माने का साथ हम निभाए तो कैसे?
Saturday, March 14, 2015
Wednesday, March 4, 2015
Friday, February 27, 2015
हमारा देश
हमारा देश आख़िर कहा जा रहा है
क्या देश को Twitter, linkedin, Facebook और whats app चला रहा है
नेता तो वोट पा संतुष्ट है
अपने अपने महलो मे सुकून से स्थापित है
देश मे घट रही अनहोनी पर, बस शोक जताते है
देखो येही नेता है जो हमारा देश चलते है
वही हम और आप भी अपनी ज़िमेदारी से पीछे हटते जा रहे है
आपना भार इन गीने चुने नेताओ पर मदते जा रहे है
नियम क़ानून तो बन गये है
अब इन्हे निभाएगा कौन?
देश की रखवाली का दायित्व संभालेगा कौन?
ये किसी एक के बस की बात नही
बदलाव के लिए मिलने की ज़रूरत है
तो क्यों ना मिलना ही सही
गुल से ही तो गुलस्ता बनता है
सबको साथ आगे आना चाहिए.
देश की तराकी मे मिलकर हाथ बढ़ाना चाहिए
Saturday, November 15, 2014
सूरज की किरणे
खिड़की के जालो से छन कर रोशिनी आँखों में चमचमाती है
आँखों को मसलकर सूरज को उगते देखती हूँ
धीरे- धीरे आसमान को नए रंगो में सजते देखती हूँ
सूरज की छटा चारों ओर बिखरते देखती हूँ
अलसाई आँखों में एक उम्मीद को जागते देखती हूँ
सूरज की लालिमा सा ख्वाइशों को बढ़ते देखती हूँ
सूरज की तपती धुप में खुद को संघर्ष करते देखती हूँ
तब पेड़ की छांव देख कुछ सुकून के पल टटोलती हूँ
फिर ख्वाइशों को छूने का दिल करता है
पर रात होते होते सब कुछ धीमा हो जाता है
सूरज के ढ़लने पर आस को टूटते देखती हूँ
इसी उतार चढ़ाव में, मेरा जीवन बस चल रहा है
Friday, October 24, 2014
स्मृतियाँ
Thursday, October 16, 2014
विरान गलियां
विरान गलियां
सन्नाटों में भी सन- सन करता है कोई
सपने तिनको की तरह बिखर गए है
अब भी उन तिनकों में आशियाना देखता है कोई
जहाँ सारी इच्छाएं दम तोड़ देती है
वहाँ एक नई उम्मीद की कीरन देखता है कोई
इन तंग गलियो में भी
स्वछंद साँस लेता है कोई
जहाँ होड़ में है सब भागते
वहीं हलके कदम उत्साह से चलता है कोई
जहाँ सबका है शोशल स्टेटस पर ध्यान
वहीँ किसी के मायूस चेहरे पर नन्ही सी मुस्कान बिखरता है कोई
इस रंगीन दुनिया में भी बेरंग रह जाता है कोई
तो कभी ज़मीन पे जन्मा, आसमान को नापता है कोई
ये आम आदमी ही, कुछ अनोखा कर गुजरता है कभी
हाथ की लकीरों को पीछे छोड़ आगे बढ़ चलता है कोई
वहीं हलके कदम उत्साह से चलता है कोई
जहाँ सबका है शोशल स्टेटस पर ध्यान
वहीँ किसी के मायूस चेहरे पर नन्ही सी मुस्कान बिखरता है कोई
इस रंगीन दुनिया में भी बेरंग रह जाता है कोई
तो कभी ज़मीन पे जन्मा, आसमान को नापता है कोई
ये आम आदमी ही, कुछ अनोखा कर गुजरता है कभी
हाथ की लकीरों को पीछे छोड़ आगे बढ़ चलता है कोई
Sunday, October 12, 2014
Thursday, October 9, 2014
कलम
जब सब सो रहे होते है
तो मेरा हृदय और दिमाग कुछ नया गढ़ रहा होता है
वहाँ जब सब गहरी नींद में डूबे होते है
मैं यहाँ अपनी भावनाओ को टटोलता हुआ करवटे लेता है
इन सब को बुनकर, एक नई कविता गढ़ता हूँ
दोनों एक दूसरे से बात करते है
उस मैं के अंदर और बहार की दूरी तय करते है
और अपने एक्सपीरिएंस (Experience) कोरे कागज पर शेयर (share) करते है
Tuesday, October 7, 2014
वक्त
पर ये नहीं जानता था ,
एक दिन ये वक्त मुझे थाम लगा
समय तो रेत सा हाथ से फ़िसल गया
पर शायद मेरे पाँव को जकड़ लिया
मैं आगे नहीं बढ़ा
इतना श्रीण सा हो गया
की बाकी सब बेमतलब सा जान पड़ा
वक्त ने तोह अपनी सुई की गति रोकी नहीं
पर मुझे शिथिल कर गया
वक्त ने घाव तोह भर दिए
पर निशान नहीं मिटा पाया
हूंठो पे हँसी तो ला दी
पर आँखों की नमी नहीं हटा पाया
वक्त को मैं क्या थमता
वक्त ने मुझे ही थाम लिया था
Monday, October 6, 2014
दस्तक
चिलमन की ओट से बार-बार निहारने लगा था वो
क्या करे ये दो नैना नादान
होठ तो कुछ न बोलते
पर आँखों से छेड़ छाड़ करने लगा था वो
सब सुन्दर लगने लगा था
उन फूलों की मैंहक
प्यारी चिड़ियों की चहक
लब्ज़ नहीं खामोशी बोलती थी
अचानक ही इतना हल्का महसूस हुआ
मानो पंछी के संग उड़ रही हूँ क्षितिज तक
दर्पण को बार- बार निहारने लगी थी मैं
जाने क्या सोच यूँ मुस्कुराने लगी थी मैं
अब बस उन यादों में समाने लगी थी मैं
दिल के दरवाज़े पे दस्तक दे गया था वो
Sunday, October 5, 2014
ख़्वाब
ख़्वाब
खामोशी का आलम था
मन में कुछ हलचल होती
अपने ही ख़्वाब संजोती
यादों का पिटारा ले
पर फैलाये उड़ जाती वो
सुखद स्मृतियों की लहरें उठती
गुमनाम गलियों में न जाने कहाँ खो जाती वो ?
नज़रों के सामने से हक़ीकत ओझल होती
स्वप्नों और आशाओं की दूनियाँ में चल कर जाती वो
कदमों की थाप का आभास तो न होता
बैठे- बैठे ही सबसे बेख़बर हो जाती वो
यादों का पिटारा ले
पर फैलाये उड़ जाती वो
Saturday, October 4, 2014
श्याम दूसरी कक्षा का छात्र है ,नाम के साथ - साथ उसका वर्ण भी काला है। मैंने उसे अकेले स्कूल जाते देखा तो पूछ लिया "आज तुम अकेले? मम्मी छोड़ने नहीं आयी"। वह फट से बोल दिया "मैं तो रोज ही अकेले आता हूँ।
मैंने पुछा: और मम्मी! वो बोला - वह तो काम करती हैI मैंने जिज्ञासा के कारण पूछ लिया - कौन सा काम? वह बोला " बर्तन धोती है। " फिर जाने मुझे कौन सी गरज पड़ी थी। मैंने पुछा "और तुम्हारे पापा "।
वह बोला इलेक्ट्रिक शॉप में। फिर मैंने पुछा घर में जाते समय क्या पापा घर में रहते हैं। वह फिर मुझे कुछ देर एकटक देखता रहा फिर बोला - नहीं घर में मै और मम्मी ही है। मैंने फिर पुछा- और पापा। वह बोला - उन्हें करंट शॉक लग गया।
मैंने दोबारा पुछा: क्या अब वह हॉस्पिटल में हैं।
वह बोला - नहीं।
वह बोला "जब उन्हें करंट शॉक लगा तब ही मर गए।" इस बात कहते समय उसकी आँखों में कितनी मामिर्कता छा गई थी यह मै नहीं जानती हूँ।
पर तब भी मैं अपनी उत्सुकता रोक न सकी और पूछ बैठी "कब? " वो अपने छोटे- छोटे हांथो को पास लाकर इशारा करते हुए बोला " जब मैं इतना छोटा था"।
सच है हम जितना पा लेते है, उससे और अधिक करते है पर ये भूल जाते है कइयों की स्तिथि तो और भी बुरी होती हैI हमें ईश्वर ने सामर्थ तो दिया ही है की हम स्वयं अपने लिए मार्ग ढूंढ ले ।
तब भी हम अपने दुख पर ईश्वर को ही दोषी मानते है। कभी भी उसके प्रति कृतघ्न नहीं रहते।
Wednesday, September 17, 2014
काश ये दुनिया मेरा कैनवास होता
अपनी कल्पना को कैनवास पर उतारती हूँ
मन के भाव को कुछ टेढ़ी- मेढ़ी लाइनों और रंगो के माध्यम से निखारती हूँ
एक बेजान से कागज़ में नई जान डालती हूँ
इस तरह कोरे कागज़ पर मैं अपना सपना सवारती हूँ
काश ये दुनिया मेरा कैनवास होता
मेरा ब्रश उसमें भी कोई नई कलाकारी करती
इसमें रहते रंग -बिरंगे प्यादों को एक खूबसूरत से दृश्य में ढालती सुंदर रंगो को चुन उसे और मनमोहक बनाती
फ़िर उस पेंटिंग को फ्रेम में क़ैद कर अपनी वॉल पर मैं सजाती
काश ये दुनिया मेरा कैनवास होता !
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