Sunday, June 21, 2015

ग़ज़ल

जो लौट कर गये थे
कहकर की आनेवाले है
फिर पलटकर क्यों देखा भी नहीं

हमने उसको टोका नहीं
उसने ख़ुद को रोका नहीं
और तकदीर ने दिया, कोई मौका भी नहीं
इंतज़ार जो मेरा नसीब बन गया है
उसे इसकी खबर भी नहीं

कर दिया रुसवा भरे बाज़ार में, बस तेरे इनकार ने
जाने क्यों अब इतनी बेमुर्रवत हो गयी है जिंदगी
कभी देखी थी जन्नत, पर अब मिलन ख़यालो में भी नहीं


Saturday, June 13, 2015

बारिश का मौसम


जब भी नभ में बादल घिरते है 
तब नभ से शीतल नीर बरसते है 
मेघ गरज- गरज कर हमें संगीत सुनते है 
ये अपनी गरिमा से हमें लुभाते है 
नन्हीं -नन्हीं बूंदे  धरती पर गिरती है 
मन को सौंधी खुसबू से भरती है 
हर तरफ खुशी की लहरे है छायी 
किसान बारिश के आगे नत मस्तक हो जाते है 
सुख से अपनी बींजो  को उपजाते है 
चाक की श्रुधा और प्यास जाएगी 
देखा अब हरियाली कालीन धरा पर बिछ जाएगी 
वन में मयूर पर फैलाये नृत्य करने लगे है 
बच्चे  भी पानी में हिलोर, उछल-कूद करने लगे है 
इस बारिश की  बौछार में  करे गरम चाय की प्याली 
 सब के चेहरों पर खिल उठे लाली 
अब रहे न कोई गम 
लो आया बारिश का मौसम 

Friday, June 5, 2015

नर्तकी अब नाच कर ले

नर्तकी अब नाच कर ले

आ गए सब द्वार तेरे 
बैठे चारो ओर तेरे घर को घेरे
मैं भी आया द्वार तेरे 
अपने घर से मुँह फेरे 
नर्तकी अब नाच कर ले 

नर्तकी तेरा नाच देखा 
लोंगो ने तेरे लिए कितना पैसा फेंका 
लेकिन मैं तुझे क्या दूँ, क्योंकि मैं अकेला 
मेरे संग यहाँ मेरा न साथी न कोई चेला 
नर्तकी अब नाच कर ले 

लोग कहते है द्वार तेरे कभी न जाना 
बदनाम होगा जिसने ये कहना न माना 
पर तेरे द्वार आकर मैंने कितना सुकून पाया 
कितनी गजब की है माया 

फिर मैंने सोचा 
सच में तेरा जीवन है क्या 
तू गाती दुसरो के लिए है 
नाचती किसी और के लिए है 
सुख देती है दुसरो को 
और स्वयं आंसुओ के घूंट पीती 
तेरा क्या 
फिर भी बदनाम रहती तू 
नर्तकी फिर भी नाच कर ले तू 

Saturday, May 23, 2015

अंडरवर्ल्ड डॉन और पुलिस






Underworld, Don, भाई, गुंडे, Terrorist, Naxalite सच में एक दयनीय जीवन जीते है।  उनके पास पैसा खूब होता हैं, पर आज़ादी छिन जाती हैं।  छुप - छुप कर जीना पड़ता है।  मार काट तो  जीवन का हिस्सा बन जाता  है।  वे हज़ारो निहत्थे आम आदमी को बिना किसी कसूर मौत की नींद सुला देते है।  यही मार काट उनकी शक्ति का परिचायक बन जाता है।  मरते समय वे लोंगो की आँखों में ख़ौफ़, आँसू  और डर देख कर प्रसन्न  होते है, उन्हें मज़ा आता है। डराना-धमकाना तो उनका आम कार्य है। इस क्षेत्र में यदि कोई कच्चे दिलवाला आ  जाये तो वह उसी के बीच पीस कर रह जाता है।  रोज़-रोज़ खून की नदियों को देखते -देखते एक दिन न जाने कब उसका खून भी बह जाता हैं ।  उनकी मृत्यु कब, कहाँ,  कैसे हो जाये उन्हें नहीं पता।  पर इतना ज़रूर पता है उन्हें मारना ज़रूर है।  पुलिस की गोली से या अपने ही किसी भाई के हाथ से।  इन सब लोंगो में यह बात सामान पायी जाती है की वैसे वे ख़ुशी से हज़ारों को गोली से उड़ा देते है और तब भी उनकी आँखों में कोई खौफ, डर  या दर्द नहीं होता पर अपनी मृत्यु के समय उन्हें नाना प्रकार के डर, परिवार की याद, गलती का एहसास हो जाता है। तब वही व्यक्ति जो किसी की लाइफ की कोई कद्र नहीं करता है जिसके हांथो से हज़ारों की जिंदगी होती है (आज) एकाएक अपनी मृत्यु आने पर ज़िन्दगी की भीख मांगता है। पर आखिर में इन्हे पुलिस अपनी गोली का निशाना बना लेती है । जिसे वे encounter का नाम देते है । उनके शव का ना अंतिम संस्कार होता है ना वो दफनाए जाते है । जिनके बाद ना उनके नाम सुनाई देते है ना काम। इस मामले में पूरा दोष इनको देना गलत है। पुलिस को एनकाउंटर के अलावा कोई अलग रास्ते इख़्तियार करने चाहिए जिससे वे इन्हे पकड़ सके और सुधार सके, क्योंकि एनकाउंटर एक अप्रिय घटना है। इसमें कई बार आम इंसान भी शिकार हो जाया करते  है।पर पुलिस करे तो क्या करे। ऐसे लोग समझने से समझते भी तो नहीं। उनका दिल नहीं, दिमाग नहीं, सिर्फ उनकी गोली बोलती है। उनके भाव नहीं होते बस पिस्तौल चलती है। उनमे देश प्रेम की भावना नहीं केवल पैसा बोलता है। पैसे की  खातिर वो देश को भी बेंच देते है। ऐसे लोगों को क्या एक मौका भी दें उचित होगा ? .... 
पर मनुष्य को कब और किसने ये अधिकार दे दिया की वह ईश्वर के रूपों को यूहीं मौत की घाट उतार देना, यूहीं उनकी जान लेले। जितनी निर्दय, क्रूरता से ये डॉन, भाई लोग मारते है। उनसे भी दो हाँथ ऊपर होती है पुलिस। जो उन्ही को उससे भी अधिक निर्दयता से गोली मार देते है। ये गोली के शहंशाह पुलिस की ही गोली खाकर अपना दम तोड़ देते है। अब आप समझ ही रहे है। हिंसा से किसी का भी कभी भला नहीं हो सकता है। यदि आप हिंसा से कुछ प्राप्त करते तो हिंसा ही उसे डूबा ले जाती है। गांधीजी भी इसे भली भांति जानते थे इसलिए तो उन्होंने अहिंसा का साथ दिया और तभी तो उन्हें कोई आपने लक्ष्य को पाने से रोक न सका और हम अब आज तक स्वतंत्र है और रहेंगे। 

Tuesday, April 28, 2015

काश दिल में यादें लिखने वाली पेंसिल का भी कोई रबर होता



काश दिल में यादें लिखने वाली
पेंसिल का भी कोई रबर होता

वक़्त बेवक़्त आती यादो को रोक पाती 
मेरे दिल का दरवाज़ा अक्सर खुलता बंद होता रहता है 
और ज़िद्दी यादों की ताका -झाँकी भी चलती ही रहती है
क्या करे दिल हज़ारों ख्वाइशें जो  करता रहता है
कभी दिनों में, कभी घण्टों में, तो कभी पलो में 
रह रह कर दस्तक दे जाती है 
ये वक़्त और जगह नहीं देखती है 
बेवक़्त ही सताती है 
कभी तो तन्हा भी छोड़  जाती हैं 
सच में, इसे बहला पाना आंसा नहीं 
इसलिए सोचती हुँ 
काश दिल में यादें लिखने वाली
पेंसिल का भी कोई रबर होता



Tuesday, April 21, 2015

उड़ान



उड़ान 
उसकी मुट्ठी से जादू का पिटारा निकला था उस दिन
मेरे सपनों का नज़ारा निकला था उस दिन
मुट्ठी हर बार की तरह खाली नहीं थी
उसमे मेरी ख्वाइशें क़ैद थी
जो आज खुल रही थी
उसने ज़रा सी ढ़ील दी और मैं हवा में उड़ गयी
चार दिवारी में बंद कमरा अब मुझे क्या रोकता
मेरे पैरों को तेज़ गति जो मिल गयी थी 


Sunday, April 19, 2015

एक छोटी सी खिड़की से कितनी दुनिया देख चूका


मैं तीसरे माले पर रहता हूँ
अपने में कुछ खोया- खोया
सब से बेखबर
अपनी छोटी सी चार दिवारी में बंद दुनिया
घर में एक छोटी सी खिड़की है
जो मुझे दूसरों से कभी कबार जोड़ देती है
बैठे- बैठे वहाँ से आते जाते लोगों को देखा करता हूँ
उनकी हँसी में अपनी हँसी खोजा करता हूँ

नाख़ून चबाता जब सामने से कोई निकले
मेरा दिल ! क्या हुआ ये जानने मन मचले
रुआँसा सा जब कोई दबे पाँव चला जाता है
मेरी जिज्ञासा भी बढ़ा जाता है
सोचता हूँ, पूंछूं क्या हुआ ?
पर तहज़ीब का दायरा याद आ जाता हैं

बॉल लिए जब कोई अपनी धुन में चला जाता हैं
कभी गेंद आकाश में उछाले, तो कभी ज़मीन पर
कभी उँगलियों पर रखकर  करतब दिखाता
उसे देख मझे मेरा बचपन याद आता

सर्दी के मौसम में, मैं कोट पे कोट डाले बैठता हूँ
तो खिड़की के बाहर बिखारी को मैं नंगे बदन सुकड़ता सा पता हूँ
तब अपने शरीर पर स्वेटर और ओवरकोट के अंदर भी
शरीर पर उठे काँटों के अहसास से सिहर सा जाता हूँ

जब चार कंधे शव को गली से ले जाते
तो उसके परिजन का शोक देख मेरे आँखों में आँसूं छलक आते

मैं इस खिड़की पर लटका देखता हूँ हज़ारों नज़रें
हज़ारों चेहरे, कोई नाचता, कोई गाता, कोई रोता और कोई मुस्कुराता
कितनी अलग है ये दुनियाँ 
खिड़की के अन्दर एक दुनियाँ
खिड़की के बाहर अनेकों दुनियाँ

Saturday, April 18, 2015

चोरी

चोरी करना कला नहीं, मजबूरी है
उस बेबस बाप की, जिसका बेटा भूख से तिलमिला रहा है
उस बीवी की, जिसका पति शराब में धुत किसी कोने में पड़ा है
उस मासूम बच्चे की, जिसे अब तक उसका मन पसंद खिलौना नहीं मिला
उस माँ की,  जो अपने परिवार को खुश देखना चाहती है
ग़लत वो नही, ग़लत तो हालत है





Tuesday, April 14, 2015

Short Cut

शॉर्टकट

साधारण मार्ग से सब है अंजान
रहती है शॉर्टकट की सबको  तलास
Cheating कर exam में  आते है first 
Practical result हो जाता है worst

शॉर्टकट के प्रचलन ने लाई जीवन में कितनी complications
अब SMS का ज़माना है 
तो briefing को हमें निभाना है 
अब शॉर्टकट सर चढ़कर बोल रहा है 
पिताजी को अब पा सारी दुनिया बोल रहा है 

जब बच्चे ने एक important  बात का जिक्र बाप से करना चाहा 
पिता बोले "flight का time हो रहा है 
ज़रा शार्ट में बताना "
बेटा बोला, ठीक है ज़रा 4000 का नोट तो पकड़ना
पिता ने कहा how rude 
बेटा बोला Daddy I was going according to your mood
कल मेरा जन्मदिन है दोस्तों को पार्टी है देनी
बाप बोला मिल जाएंगे, ऐसे पहले क्यों नहीं बताया 
पर Daddy मैंने तो बस आपका समय बचाया 

आखिर क्यों?
कुछ पल के परिश्रम से घबराकर 
लोग शॉर्टकट को अपनाते है
देखो स्वयं ही मुसीबत से घिर जाते है 
शार्टकट सारी  अच्छी बातों को करता है कट 
फिर भी सब बोले 
Long route ही क्यों 
"Lets take the shortcut"

Sunday, April 5, 2015

Ghazal



माना की मसले बहुत है दुनिया में 
और ये रिस्ते भी कम संजीदा ऩही
पर क्या ज़िंदगी अब इतनी भी मयस्सर नहीं 
की सुकून के कुछ लम्हे गुज़ार ले...

सुना है, ग़मों से रूबरू होते ही 
शकशियत  में और निखार आ जाता है 
लो ये भी कर लिया 
पर अब भी कुछ नहीं बदला 
न फ़ज़ाए बदली 
ना ये नज़ारे बदले 
गीले भी है, शिकवे भी है 
और खड़े सब मसले भी है 
शायद ये ही ज़िन्दगी है और शायद नहीं भी है


Saturday, March 28, 2015

खोई सी उम्मीद

आज मेहनत नहीं नसीब की बात करता है आदमी 
अपनों की नहीं सिर्फ अपनी बात करता है आदमी  
अब विचार संकीर्ण होते जा रहे है 
झूठ को सच कहता है आदमी 
मुर्दा घर में भी बड़े शान से चलता है आदमी 
ईमानदारी ने जैसे आँख मूँद ली हो 
बेशर्मी का नंगा नाच दिखा रहा है आदमी 
आज डर का माहौल सजा है
हर तरफ़ बमो और विस्फोटो का चर्चा छिड़ा है 
कुछ को ये विनाश छूकर गया है 
तो कइयों का चिथड़ा पड़ा है 
आज ईश्वर को मन नहीं मंदिरो में खोजा जाता है 
जब अन्याय से लड़ने को कोई अकेला खड़ा आवाज़ लगता है 
तब दूसरा उससे कुछ कदम दूर चला जाता है 
और न्याय भी चादर ओढ़ मीठी नींद सो जाता है 
क्या ये सुन्दर गुलस्ता बिखर जाएगा 
या कोई इसकी सुरक्षा का भार उठाएगा 
शिकायत तो हम तुम हर पल किया करते है 
चलो उम्मीद की ज्योत जलाए 
एक कदम तुम चलो तो एक कदम हम चलते है 

Thursday, March 26, 2015

खुदगर्ज़ ज़माना

खुदगर्ज़ ज़माना 

इस खुदगर्ज़ ज़माने का साथ हम निभाए कैसे?
कौन सच्चा है ये आजमाए कैसे?
छुप बैठा है भेड़ की खाल में भेड़िया 
उसे  अब हम पहचाने कैसे?

सब को खुला मैदान चाहिए, घर नहीं माकान चाहिए
कोई स्वछंद परिंदा पर फैलाए तोह कैसे?
इस खुदगर्ज़ ज़माने का साथ हम निभाए कैसे?

घड़ी की नोक पर भागता है आदमी 
कुछ बात करनी थी, पल भर के लिए उसे ठहराए कैसे?
क्रोध भरा है भीतर, पर प्यार से इन्हें समझाए कैसे?

लहू अब जम  सा गया है 
वक्त भी थम सा गया है 
जहाँ  ज़िंदगी  से है मौत सस्ती 
डराती है ये वीरान बस्ती 
सोए हुए इस आदमी को अब जगाये कैसे?
घुटन की इस ज़ंजीर से बाहर खुद को निकाले कैसे?

ये कहने को तो कहता जाता है 
भाषण, नारेबाजी तोह कही आर्टिकल छपवाता है 
कहने से परे, कहने की पहलकदमी कोई नहीं करता 
वो पहल, वो शुरूआत  कोई करे तो कैसे ?
इस खुदगर्ज़ ज़माने का साथ हम निभाए तो कैसे?

Saturday, March 14, 2015

ग़ज़ल

ग़ज़ल 

उलझनों ने सुलझना नहीं सीखा 
आज भी हमने इंसानो को परखना नहीं सीखा 
मिल रही है हमें वफ़ा की सज़ा 
फिर भी हमने बेवफ़ाई करना नहीं सीखा !!!




Friday, February 27, 2015

हमारा देश



हमारा देश आख़िर कहा जा रहा है
क्या देश को Twitter, linkedin, Facebook और whats app चला रहा है 
नेता तो वोट पा संतुष्ट है
अपने अपने महलो मे सुकून से स्थापित है
देश मे घट रही अनहोनी पर, बस शोक जताते है
देखो येही नेता है जो हमारा देश चलते है

वही हम और आप भी अपनी ज़िमेदारी से पीछे हटते जा रहे है
आपना भार इन गीने चुने नेताओ पर मदते जा रहे है

नियम क़ानून तो बन गये है
अब इन्हे निभाएगा कौन?
देश की रखवाली का दायित्व संभालेगा कौन?
ये किसी एक के बस की बात नही
बदलाव के लिए मिलने की ज़रूरत है
तो क्यों ना मिलना ही सही
गुल से ही तो गुलस्ता बनता है
सबको साथ आगे आना चाहिए.
देश की तराकी मे मिलकर हाथ बढ़ाना चाहिए

Saturday, November 15, 2014

सूरज की किरणे

सुबह जब परदे की ओट से बाहर देखती हूँ 
खिड़की के जालो से छन कर रोशिनी आँखों में चमचमाती है 
आँखों को मसलकर सूरज को उगते देखती हूँ 
धीरे- धीरे आसमान को नए रंगो में सजते देखती हूँ 
सूरज की छटा चारों ओर बिखरते देखती हूँ 
अलसाई आँखों में एक उम्मीद को जागते देखती हूँ 
सूरज की लालिमा सा ख्वाइशों को बढ़ते देखती हूँ 
सूरज की  तपती धुप  में खुद को संघर्ष करते देखती हूँ
तब पेड़ की छांव देख कुछ सुकून के पल टटोलती हूँ 
फिर ख्वाइशों को छूने का दिल करता  है 
पर रात होते होते सब कुछ धीमा हो  जाता है 
सूरज के ढ़लने  पर आस को टूटते देखती हूँ
इसी उतार चढ़ाव में, मेरा जीवन बस चल रहा है


Friday, October 24, 2014

स्मृतियाँ




मेरी स्मृतियाँ कभी- कभी सैलाब सी आती है
और मुझे उसमे बहा ले जाती है
कभी होंठो पे मुस्कान
तो कभी आँखों में नमी दे जाती है

मेरी स्मृतियाँ कभी- कभी सैलाब सी आती है
वो सारे पल, सामने सजग खड़ा कर जाती है
वो प्यारी यांदे, वो खट्टी- मीठी बाते
सब कुछ सामने नाचने सा लगता है
दिल के तारों को ये एहसास छू कर जाता है
वो लम्हें फिर जिए दिल चाहता है

मेरी स्मृतियाँ और मैं अलग नहीं है
क्योंकि दिल के बज्म में एक कोना जो तुम्हारा है 

Thursday, October 16, 2014

विरान गलियां

विरान  गलियां 

इस विरान सी गलियों में रहता है कोई 
सन्नाटों में भी सन- सन करता है कोई 
सपने तिनको की तरह  बिखर गए है 
अब भी उन तिनकों में आशियाना देखता है कोई 
जहाँ सारी इच्छाएं दम तोड़ देती है 
वहाँ एक नई उम्मीद की कीरन देखता है कोई 

इन तंग गलियो में भी 
स्वछंद साँस लेता है कोई 
जहाँ होड़ में है सब भागते 
वहीं हलके कदम उत्साह से चलता है कोई 

जहाँ सबका है शोशल स्टेटस पर ध्यान 
वहीँ किसी के मायूस चेहरे पर नन्ही सी मुस्कान बिखरता है कोई 
इस रंगीन दुनिया में भी बेरंग रह जाता है कोई 
तो कभी ज़मीन पे जन्मा, आसमान को नापता है कोई 
ये आम आदमी ही, कुछ अनोखा कर गुजरता है कभी 
हाथ की लकीरों को पीछे छोड़ आगे बढ़ चलता है कोई 



Sunday, October 12, 2014

एक मुस्कान

  एक मुस्कान जाने क्यों कुछ गुनगुना गई
  जीने के मायने सीखा गयी
  बीते नगमें याद दिला गयी
  औरों को भी है गम बतला गयी
  खामोशी से अपना किरदार निभा गयी
  मेरे डर पर विजय दिला गयी
  एक मुस्कान जाने कितना कुछ गुनगुना गई





Thursday, October 9, 2014

कलम 


मेरा कागज़- कलम सन्नाटो में चलता है 
जब सब सो रहे होते है 
तो मेरा हृदय और दिमाग कुछ नया गढ़ रहा होता है
वहाँ जब सब गहरी नींद में डूबे होते है 
मैं यहाँ अपनी भावनाओ को टटोलता हुआ करवटे लेता है 
कभी अपने तो कभी चितपरिचित  के बीते पल से गुजरता हूँ 
इन सब को बुनकर, एक नई कविता गढ़ता हूँ 
ये वो लम्हें है जहाँ मैं और मेरा मन 
दोनों एक दूसरे से बात करते है 
उस मैं के अंदर और बहार की दूरी तय करते है 
और अपने एक्सपीरिएंस (Experience) कोरे कागज पर शेयर (share) करते है 

Tuesday, October 7, 2014

वक्त


मैं वक्त को थामना चाहता था 
पर ये नहीं जानता था ,
एक दिन ये वक्त मुझे थाम लगा
समय तो रेत सा हाथ से फ़िसल गया 
पर शायद मेरे पाँव को जकड़ लिया 
मैं  आगे नहीं बढ़ा 
इतना श्रीण सा हो गया 
की बाकी सब बेमतलब सा जान पड़ा 
वक्त ने तोह अपनी सुई की गति रोकी  नहीं
पर मुझे शिथिल कर गया 
वक्त ने घाव तोह भर दिए 

पर निशान नहीं मिटा पाया 
हूंठो पे हँसी तो ला  दी 
पर आँखों की नमी नहीं हटा पाया 
वक्त को मैं क्या थमता 
वक्त ने मुझे ही थाम लिया था 

Monday, October 6, 2014

दस्तक

दिल के दरवाज़े पे दस्तक दे गया था वो 
चिलमन की ओट से बार-बार निहारने लगा था वो 
क्या करे ये दो नैना नादान 
होठ तो कुछ न बोलते 
पर आँखों से छेड़ छाड़  करने लगा था वो 
सब सुन्दर लगने लगा था 
उन फूलों की मैंहक 
प्यारी चिड़ियों की चहक 
लब्ज़ नहीं खामोशी बोलती थी 
अचानक ही इतना हल्का महसूस हुआ 
मानो पंछी के संग उड़ रही हूँ क्षितिज तक 

दर्पण को बार- बार निहारने लगी थी मैं 
जाने क्या सोच यूँ मुस्कुराने लगी थी मैं 
अब बस उन यादों में समाने लगी थी मैं 
दिल के दरवाज़े पे दस्तक दे गया था वो

Sunday, October 5, 2014

ख़्वाब

ख़्वाब 


जुबां सी गई हो मानो 
खामोशी का आलम था 
मन में कुछ हलचल होती 
अपने ही ख़्वाब संजोती 
यादों का पिटारा ले 
पर फैलाये उड़ जाती वो 

सुखद स्मृतियों की लहरें उठती 
गुमनाम गलियों में न जाने कहाँ खो जाती वो ?
नज़रों के सामने से हक़ीकत ओझल होती 
स्वप्नों और आशाओं की दूनियाँ में चल कर जाती वो 
कदमों की थाप का आभास  तो न होता 
बैठे- बैठे ही सबसे बेख़बर हो जाती वो 
यादों का पिटारा ले 
पर फैलाये उड़ जाती वो 

समुंदर की लहरें

" समुंदर की लहरें "


कुछ सुकून सा देती 
लहरा लहरा के चलती है 
ये समुंदर की लहरें यूँही मतवाला  सा करती हैं 

ठंडी ठंडी सी सर्द हवाएँ 
कानों में कुछ सरसरा जाती 
बाह फैलाये मैं उस पल को जी रही हूँ 
निचे कोसो दूर तक पानी हैं 
ऊपर आकाश भी आसमानी हैं 
आज पता चला शोर की शान्ति कुछ ऐसी होती हैं  

Saturday, October 4, 2014

श्याम दूसरी कक्षा का छात्र है ,नाम के साथ - साथ उसका वर्ण भी काला है। मैंने उसे अकेले स्कूल जाते देखा तो पूछ लिया "आज तुम अकेले? मम्मी छोड़ने नहीं आयी"। वह फट से बोल दिया "मैं तो रोज ही अकेले आता हूँ। 
मैंने पुछा:  और मम्मी! वो बोला - वह तो काम करती हैI मैंने जिज्ञासा के कारण पूछ लिया - कौन सा काम? वह बोला " बर्तन धोती है। " फिर जाने मुझे कौन सी गरज पड़ी थी। मैंने पुछा "और तुम्हारे पापा "
वह बोला इलेक्ट्रिक शॉप में। फिर मैंने पुछा घर में जाते समय क्या पापा घर में रहते हैं। वह फिर मुझे कुछ देर एकटक देखता रहा फिर बोला - नहीं घर में मै और मम्मी ही है।  मैंने फिर पुछा- और पापा। वह बोला - उन्हें करंट शॉक लग गया।

मैंने दोबारा पुछा: क्या अब वह हॉस्पिटल में हैं।
वह बोला - नहीं।  
तो ,मैंने न चाहते हुए भी क्यों उससे एक और सवाल किया " क्यों नहीं? फिर कहाँ है पापा।" 
वह बोला "जब उन्हें करंट शॉक लगा तब ही मर गए।" इस बात कहते समय उसकी आँखों में कितनी मामिर्कता छा गई थी यह मै नहीं जानती हूँ। 
पर तब भी  मैं  अपनी उत्सुकता रोक न सकी और पूछ बैठी "कब? " वो अपने छोटे- छोटे हांथो को पास लाकर इशारा करते हुए बोला " जब मैं इतना छोटा था"

सच है हम जितना पा लेते है, उससे और अधिक  करते है पर ये भूल  जाते है  कइयों  की स्तिथि तो और भी बुरी होती हैI हमें ईश्वर ने  सामर्थ तो दिया ही  है की हम स्वयं अपने लिए मार्ग ढूंढ ले 

तब भी हम अपने दुख पर ईश्वर को ही दोषी मानते है। कभी भी उसके प्रति कृतघ्न नहीं रहते

Wednesday, September 17, 2014

काश ये दुनिया मेरा कैनवास होता 


मैं एक पेन्टर हूँ 
अपनी कल्पना को कैनवास पर उतारती हूँ 
मन के भाव को कुछ टेढ़ी- मेढ़ी लाइनों और रंगो के माध्यम से निखारती हूँ 
एक बेजान से कागज़ में नई जान डालती हूँ 
इस तरह कोरे कागज़ पर मैं अपना सपना सवारती हूँ 

काश ये दुनिया मेरा कैनवास होता 
मेरा ब्रश उसमें भी कोई नई कलाकारी करती 
इसमें रहते रंग -बिरंगे प्यादों को एक खूबसूरत से दृश्य में ढालती 
सुंदर रंगो को चुन उसे और मनमोहक बनाती 
फ़िर उस पेंटिंग को फ्रेम में क़ैद कर अपनी वॉल पर मैं सजाती 

काश ये दुनिया मेरा कैनवास होता !

Sunday, September 14, 2014

बचपन 

बस थोड़ा सा खुलापन चाहिए 
दोबारा मुझे अपना बचपन चाहिए 
वो सुख में हंसी, तो दुःख में आँसू चाहिए 
वो बेफिक्री का आलम चाहिए 
वो गुड्डा- गुड्डी का खेल 
वो छुक- छुक करती मेरी रेल 
वो कागज़ की कस्ती 
और उसकी नौका तैर 
तितलियों को देखकर उछलना 
आइसक्रीम खाने को मन का मचलना 
वो रंग-बिरंगे गुब्बारे फूलना 



चाँद को भी चंदा मामा बुलाना 

ये छोटी- छोटी बातें कितनी याद आती है 
वो दादी- नानी की कहानी 
वो छन से बरस्ता पानी  
वो खिलखिलाता चेहरा वो मासूमियत 
वो तुतलाहट और टूटे- फूटे शब्द 
कितना अनमोल होता है माँ की गोद में सोना 
माँ का लाड़ पाने को झूठ- मुठ का रोना 

तब एक छोटे से कमरे में मेरा अपना एक छोटा कमरा बनाती 
पर क्यों आज आसमान को छूता मकान चाहिए 
बचपन में डॉक्टर, इंजीनियर बनना कितना आसान था 
पर बड़े होते ही इन्सान बनाना भी कितना मुश्किल सा जान पड़ता है 

AB से बढ़ का बी ए में है जा पहुंचे 
तब जानते थे क्या नहीं चाहिए 
अब जाना क्या चाहिए 
माना पढ़ लिख कर बुद्धि जीव हो गए है 
पर बचपन और यौवन में फासला कुछ बढ़ गया है 
बचपन की याद तो जैसे जम सी गयी है 
पर कभी कुछ पिघलता है 
तो बचपन की नासमझी फिर याद आ जाती है 
अब न दौलत न शौहरत चाहिए 
न ये मुकाम चाहिए 
अब ये बेमानी भाव कही छिप जाने चाहिए 
सच्चाई का नाता दिल से दोबारा जुड़ जाना चाहिए 
बस थोड़ा सा खुलापन चाहिए 
दोबारा मुझे अपना बचपन चाहिए 

Wednesday, September 3, 2014

** कल्पना की शाखाओं पर नव पल्लव विकसित होते ही रहते हैं  **

http://sapnokikalamse.blogspot.in/