Tuesday, February 9, 2016

प्रश्नों की उधेड़बुन

हे प्रभु क्यों इतने प्रश्न उठे हर पल हृदय में
जिनका जवाब हम से ना खोजा जाए
नहीं हमें उनके उत्तर ही मिल पाए
काश कि यह प्रश्न ही न बने होते
हम इस उधेड़बुन में तब बिल्कुल न पड़े होते
चैन से  जगते, चैन से सोते 
गहरी चिंतन से कोसों दूर ही रहते
पर अब जब यह प्रश्न है
तो क्या किया जा सकता है
इतना साहस तो करना ही होगा
खोज कर उन्हें कार्यरत तो करना होगा
जो भी फिर भी ना मिल पाए
तो कह दो 
हे प्रभु क्यों इतने प्रश्नों के हर पल हृदय में

Sunday, February 7, 2016

मसलो का हल

प्रक्रति का ये क्रोध कैसा है
कहीं बाढ़, कहीं सैलाब कैसा है
देखिए मेरे देश का हाल ऐसा है
कहीं भुखमरी, कहीं करोड़ो का पैसा है

जहाँ जोरदार धमाकों ने ध्यान बटोरा है
वो बेघर लोगों की सिसकिया कब सुन पाता है
दुख तो सबको ही है
दिखता उसी का है जो दिखा पता है

अगर ये बात अजीब है
यकीन माने, हॉल तो और भी पेचीदा है

मसले खड़े कर मसलो का हल नहीं निकलता
बिना ऐसा किए कोई सिला भी तो नही निकलता

तूफ़ान का आकर निकल जाना भला 
ना के बार - बार तूफ़ान का उठते रहना 
घाव पर बैठे मरहम तुम कब तक मलोगे 
एक बार पलट कर वार भी कर के देखो 

Thursday, February 4, 2016

किस्सा और हिस्सा


क्या तुम मेरी कविताओं का हिस्सा बनोगे
या तुम मेरी कहानियों का किस्सा बनोगे

किस्सा और हिस्सा 
सुनने मे एक 
किंतु कितने भिन्न

किस्सा मैं सुनाऊँगी
हिस्से के संग मैं गुनगुनाउंगी

किस्से को मैं भुलाऊँगी 
हिस्से को मैं अपनाऊँगी 

किस्सा निशा है
तो हिस्सा दिन का प्रकाश होगा

प्रिय तो दोनो है
पर किस्सा बीती बात होगा
हिस्सा मेरे साथ होगा

अब कहो क्या तुम मेरी कहानियों का किस्सा बनोगे 
या तुम मेरी कविताओं का हिस्सा बनोगे!!!!

Thursday, January 28, 2016

मेरे सलोने सपने कहीं खो गये


मेरे सलोने सपने कहीं खो गये
अंधकार की काली चादर में हर गये 
अभी भोर ना हुई थी की उन्हें याद करूँ
उससे पहले ही वे खो गये

मन में उदासी का भाव भर गया
आज नही तो कल पूरे होने की आस छोड़ गया
उदासी छोड़ नया स्वप्न देखने का भी साहस किया,
पर इसके भी गुम होने की बात सोच पाव पीछे हटा लिया

दिन बीतता गया नई रात आई, नया दिन निकाला तब उसकी उदासी छ्ठी
तब उसने अपने उज्ज्वल भविष्य के लिए दोबरा नये सपने बुने
पर इस बार उन सपनों का आकार बना
 सारा स्वप्न साकार हुआ

इससे उसके लड़खड़ते कदमों को, 
अनजाने ही सहारा मिला
हृदय के मुरझाए पुष्प फिर खिल उठे
उसके यह सपने उससे कभी ना रूठे
अब उसने अपना मुकाम हासिल किया
अब उसे लगा उसने अपना नसीब तय कर लिया

पर आज भी कहीं ना कहीं उसकी आँखों में अतीत का धुंधला पन्ना छलकता है
वह अपने पुराने सपने खोजती है, संजोती है और जोड़ती है
उन्हे याद कर रोती है
इस सपने ने दी कामयाबी पर
उस सपने को बुनने में मिली नाकामियाबी 
यह उसे हर पर कोसती है

वह अपने पहले स्वप्न को अपने अश्रुपूर्ण नेत्रों से धोती है
यह गम आज और कल का नहीं
जीवन प्रत्यंतर साथ ही रहेगा
वह अंत मे भी इस शोक मे ही मरेगी
कहेगी वो मेरे सलोने सपने कही खो गये 

Monday, January 25, 2016

कोयल


जब तुम आई कोयल रानी
हुए मुगद हम सुन तुम्हारी बानी
कोयल तुम अपना गीत सूनाओ
रोज तरानो की धुन बनाओ
कुहक कुहक कर हमे बुलाओ
फिर तुम अपना मधुर गीत गुनगुनाओ 

मीठे- मीठे आम खाती ही
और मीठे गीत सुनाती हो
हम सब के मन को बहलाती हो

लेकिन ये क्या?
जो गर्मी गयी
तुम भी हमारे आमो के पेड़ो चल दी
अब हम बस ये चाहे
अगले साल जल्दी गर्मी आए
तब तुम अपने बच्चों के संग फिर आओ
और मेरे पेड़ो के फल खाओ
साथ तुम्हारा संगीत हमे सूनाओ

Monday, January 11, 2016

काँच की चूड़ियो जैसी नारी की प्रतिमा



काँच की रंग बिरंगी, सतरंगी चूड़ियाँ मोह लेती है मन, जैसे नारी
कितनी कोमल होती है नारी, जैसे चूड़ी
नारी की खिलखिलाहट देख बजती है काँच की चूड़ी
नारी की असीम सपनों को दर्शाती है उसके हाथ की सतरंगी चूड़ी
काँच तपकर, गलकर आकृति पा बनती है चूड़ी
जैसे ये सभी ग़ूढ पा बनती है नारी
नारी, सतरंगी चूड़ियाँ से शोभा पाती है
सतरंगी चूड़ियाँ, नारी से शोभा पाती है
नारी के पशयताप मे जलती है, काँच की चूड़ियाँ
नारी के गर्व मे तेज चमति है काँच की चूड़ियाँ
नारी के गम मे चुटकर बिखर जाती है काँच की चूड़ियाँ
काँच पर दरार या चोट के बाद उसका कोई प्रायोजन नही
जैसे समझ ली जाती है नारी 
खंडित होने पर ज़िल्लत सहती है नारी
अपशगुन के नाम पर ताल दिया जाता है इनको, जैसे काँच की चूड़ियाँ
नारी के अरमान टूटने से बह जाते है आँखो से नीर
जैसे चूड़ी टूटने पर हाथ से खून 
काँच की चूड़ियाँ आग की भट्टी मे जा पिघल जाती है
जैसे नारी भावनाओं मे बह जाती है 
वह बाहर से कठोर पर अंदर से कोमल है जैसे ये काँच की चूड़ियाँ
खोशियूं की सौगात है
तो मातम का साधन है, 
ये रंग बिरंगी काँच की चूड़ियाँ
नारी की प्रतिमा जैसी ये काँच की चूड़ियाँ
काँच की चूड़ियो जैसी नारी की प्रतिमा

Friday, January 8, 2016

तुम याद बहुत आओगे

चले गये तुम अब 
लौट के ना आओगे 
फिर भी तुम हमे बड़ा रुलाओगे
और तुम याद बहुत आओगे

हमारे बीच फ़ासले है, दरमियाँ है
फिर भी हम दोनो के दिलों मे नज़दीकियाँ हैं 
इसी से तुम जितना भी दूर जाओगे 
फिर भी तुम याद बहुत आओगे

अब ना जाने कब किसी मोड़ पर मिलना हो'
तब तुम्हारा बदला स्वरूप देख पछताएगें 
पर ये सोच हम अपने दिल को समझाएँगे 
की कहीं ना कहीं हम भी तो बदले है
इस बदलाव में दोनो का दोष नही हैं
अब बस मुझे तुम ख्वाबों में 
याद बहुत आओगे

पराई पीर भला कौन अपनाए

आज मैने एक बच्चे को सड़क पर रोते बिलकते देखा                  
देखा! उसको उसकी मां से बिछड़ते देखा
उसके माथे पर शोक और चिंता की रेखा को मैने देखा
उसकी इतनी दुगम- दयनीय करुदात्मक दशा को भी मैने देखा

यह सब देखकर मैने सोचा
क्यूँ ना उसे मैं पालु 
उसे मैं अपने परिवार का एक हिस्सा ही बना लू...

उसके लिए मेरे आँखों से नीर बहा
मानो आज उसका दुख मैने स्वयं सहा
पर मैने ना जाने क्यू कुछ और भी सोचा
और अपने गिरे हर आँसू को पोंछा 

आज मैने जिसे रोते बीलकते देखा 
पर क्यू उसे देख कर भी कर दिया अनदेखा

आख़िर क्यू मैने अंत अपने स्वार्थ को देखा
कह दिया, यह तो था उसके भाग्या का लेखा

Wednesday, January 6, 2016

ये वीरानियाँ

वीरनियों में कुछ तो बात है
उसमे कुछ तो ख़ास है
दुखी दिल अकेले में चैन से रो  पता है
अपना गुम वही छोड़
मन हल्का कर
जिंदगी मे वापस लौट आता है
वीरनियों में कुछ तो बात है
उसमे कुछ तो ख़ास है

गम हमारा जब कोई ना समझे 
तब भी ये अकेलापन सब समझ जाता है
हसीन यांदो  का कमरा खोल जाता है
हमारे भीतर का मैं  जो जगत से अंजान है
उससे अवगत करता है
एकल होने पर भी साथ का एहसास दिलाता है
वह कभी हमे हँसता  है तो कभी रुलाता है
जिंदगी के अलग अलग खेलों  से हमारा परिचय करता है
गहरे चिंतन मे ले जाता है
और कभी बेबाकी से अपनी बात मानवाता है
वीरनियों में कुछ तो बात है
उसमे कुछ तो ख़ास है

उलझन



हर कदम तेरी ही परछाई क्यूँ 
आप्नत्व है फिर भी बेरुख़ाई क्यू
हर टूटा महल खंडहर नही होता
माना की हर रिस्ते का नाम नही होता
जो छूट गया पीछे वो बेगाना नही होता
छुपा लेने से स्नेह कभी कम नही होता

क्यूँ जिंदगी का हर फ़ैसला तुम्हे ही लेना था
मैं उड़ाना चाहती थी
तुमने टोका
मैं  खिलना चाहती थी
तुमने रोका
पर तो तुमने काट ही डाला था
फिर भी पिंजरा खुला रखने से डरते रहें
मायने बदल गये है...हम दोनों मे जीवन के 
पर एक बार मूड कर पीछे देखने मे कोई हर्ज तो नही होता

हर टूटा महल खंडहर नही होता
काश बद्रंग बादल मे फिर से रंग भर जाए 
सतरंगी इंद्रधनुष आए
ख़ुसीयों की बूँद कुछ मेरे आँगन मे भी छलक जाए
हर कदम तेरी ही परछाई क्यूँ 
आप्नत्व है फिर भी बेरुख़ाई क्यू?

Monday, December 21, 2015

मुस्कुराहट खुद चलकर मेरे चेहरे तक आई



बस कुछ ही घंटो की बात हैं
मैं बस में घुसी हेड सेट लगाए
सब को अनदेखा करते हुए मैं सीट पर बैठ गयी
मैं लेट हो रही थी
बार - बार नज़र कलाई घड़ी पर जाती
बॉस की डाँट की थी चिंता सताती
लगा काश कोई एसी मशीन होती
जिससे मैं फॅट से ऑफीस पहुच जाती
ये तंग वातावरद की गर्मी थी मुझे सताती 
मैने आँखें कर ली बंद
ताकि सुकून मिले कुछ चन्द
तभी किसीने कोहनी दे मारी
जब मैनें गुस्से से नज़रें बाई और घुमाई
नन्हें कोमल पैरों को अपनी गोद पर पाया 
वो मासूम सब से अंजान
अपने पाव किसी अपरिचित पर पटकाकर मुस्कुराया
मुझे देख आँखे मिंच, मा के आँचल मे छुप गया
उसकी ये हलचल को देख मैं सब भूल गयी
कितना खूबसूरत वो अहसास था
जाने उसमे क्या ख़ास था
मुस्कुराहट खुद चलकर मेरे चेहरे तक आई

Friday, December 18, 2015

Shayari


उदास मन


सारा जाग रूठा रूठा सा लगता हैं
हर पत्ता सूखा सूखा सा लगता हैं
ना जाने क्यूँ फूल भी मुरझा रहे हैं
पंछी जाने क्या गुनगुना रहे हैं
जाने क्यूँ सब उदास सा हैं
बीती बातों में एक एहसास सा हैं
नीले बदल पर मेघ है छाए
अब हमे जाने क्यू कुछ ना बाए
ना जाने सब को आज क्या हुआ हैं
सोचा तो पता इसमे मेरा ही हाथ हैं
एक छोटी सी बात हैं
की ये सब नहीं
आज सिर्फ़ मेरा मन उदास है

Monday, December 14, 2015

यदि रात ना होती


सोचो यदि रात ना होती तो क्या होता
तो कोई व्यक्ति रात मे ना सोता 
दिनभर की चिंता थकावट संघर्ष से मुक्त न होता
रात विश्राम का समय है होता 
पर यदि रात ना होती तो कोई नही सोता
यदि रात ना होती तो चाँद ना होता
चाँद की चांदनी पाने के लिए सारा जाग रोता
तब तारे भी ना होते
सभी तारोंकी टिमटिमाहट से अंजानहोते
कवि जो निशा, चाँद, तारों पर है लिखता
तब उनकी कलम ना चलती
और आगे कविता बनाने की प्रेरणा भी ना मिलती
जो रात मे सफेद कलियाँ है खिलती
वह भी ना होती
पूरा दिन शरीर को झुलसने वाली लू पड़ती सहनी
रहती हमेशा तापी हुई धरती
यदि रात ना होती, तो दिनकर की महत्ता ना होती
तब दिया, मोमबत्ती, टॉर्च, लाइट की ज़रूरत ना पड़ती
यदि रात ना होती तो आनंद ना होता
रजनी की मुस्कान ना होती
उल्लू अपना शिकार ना ढूँढ पता
दीवाली म्व दीपकों की महत्ता ना रह पाती
यदि रात ना होती तो चोरों को चोरी का मौका ना मिलता
ठंडी मे ग़रीबों को ठंड से दुर्दशा ना होती
पर कड़ी धूप भी तो सहन ना हो पाती
पहरेदार की नींद हराम ना होती 
जिन्हें दाने दाने के लाले है
दिया जलाने के लिए.तेलबत्ती की चिंता ना होती
सड़कों पर स्ट्रीट लायटो को खर्चा ना होता
कोई एल्वा एडिसिओन का जन्म ना होता
परंतु इन सब लाभो से रात की कीमत घटती नहीं
यदि रात ना होती तो हमारा जीवन अधूरा रह जाता
दूर दूर तक आनन्द दिखाने ना पता
रात मे सपने न आते
और उन्हे करने का जोश भीना आता
क्या तुम सब अब समझे 
यही रात ना होती तो क्या होता

दिए की लौ भुझहने ना पाए

एक वक़्त था, जब घोर अंधकार से साना था अपना देश
स्वतंत्रता तो रह गयी थी नाम मात्र सेश
तब एक नही, लाखो बढ़कर आगे आए
अँगरेजो पर काल की तरह मंडराए
फिरंगी को हटाने का उत्साह सबके मंन को भाए
हर कोई आज़ाद मशाल ले आए 
याद करो उन लोगों की
देश के वीर जवानों की
कुछ सालो पहले ही तो
कुछ सालो पहले ही तो 
देखा था हमने कुछ जोश नया
थी उनमे कोई बात नयी
उनके तो रग- रग मे देश प्रेम था समाया
उन्होने स्वदेश की खातिर ही तो रक्त बहाया
आज़ादी पाने के लिए अपना हर कटरा मिटाया
एक अजब सा नशा और जोश था उनमे
मानो किया हो मधूसला का सोपान उन्होने

अपनी ज़िम्मेदारी वे निभा गये
हमें एक सीख सीखा गये
पर आज क्यूँ सबने स्वार्थ की ओर खुद मूह मोड़ लिया
कहा खो गया है वो जज़्बा
कहते हो आम इंसान हो तूम 
वी भी तो इंसान थे,
वे भी थे प्यारे मा बाप के
प्यार से सिंचा था जिन्हे
पर आपनी परवाह कब थी उन्हे
गोली से हुए लाहुलुहान वे
कुछ जल गये कुछ दफ़नाए गये
पर मरते मरते भी वे कह गये
हम रहे या ना रहे.
हमारा वतन सलामत रहे 
हमारे देश की आन, मान, और शान बरकरार रहे
चाहे इसके लिए हम जो भी सहे

नत मस्तक सिश हमारा उन वीरो के नाम
जिन्होने किया अपना सर्वस्वा अपने देश के नाम
याद रहे ये दिए की लौ भुझहने ना पाए!!!!!!

Sunday, December 13, 2015

क्या ये इंसान है


इस बढ़ती जनसंख्या के बीच
हृदय संकीर्ण हो गया है

पहले यादों में जिया जाता था
पर अब यादें आने का समय नहीं 
क्या ये इंसान है

कोई रहा हो कृतघना तुम पर जितना भी
पर अब धन्यवाद देने का समय नहीं है
उपर से उनकी कृतघ्नता को पैसो मे तोला जाता है
क्या ये इंसान है

पहले उँची सोच से लोगों को परखते थे
पर अब उँची पदवी ही उनका चरित्रा प्रदर्शक बन गया है
धन का तो उच्च पदवी वालों के घर पे है बसेरा
निर्धन को नहीं दिखाता धन अपना चेहरा
क्या ये इंसान है

ये कैसी विडंबमा है, लोग धन के पीछे भागते है
भाई- भाई को भी ना पहचानते है'
बस धन दौलत को ही अपना सगा  मानते है 
अब कहो, क्या ये इंसान है

क्या सच में इस बढ़ती जनसंख्या के बीच
हृदय संकीर्ण हो गया है

Saturday, December 12, 2015

Why the emotions are short lived?

I saw a old man
On a street road 
Carrying a heavy load
He was struggling to walk
& I was hesitant to help or to talk


I go further...
Came across a beggar lady
Who seemed extremely needy
I cried. 
But soon my tears dried 
Looked as if my instinct lied
Wondering...Why the emotions are so short lived?
Some are noticed & some go intentionally unnoticed.

Tuesday, December 8, 2015

Dayara

जब रात में थक कर कुछ सोचती हूँ
लगता है की शायद शरीर पर सीलन सी पड़ गयी है
कुछ समय से बेरोज़गार सी पड़ी है
अपने आपको सर्कस के जोकर सा पाती हूँ
सासों में घुटन, तंग हवओ में जीती हूँ
दोष किसका कहूं, शिकायत किससे करूँ,
रोजमर्रा के बोझ  में इच्छायें दम तोड़ने लगी है
आख़िर मेरी ज़िंदगी कहा जा रही है
इन चार नपी तुली लाइनों के दायरों मे दबी जा रही है

Sunday, December 6, 2015

नोट लो वोट दो

अब नेता बनना आसान हुआ
बिन कुछ किए ही नेता महान हुआ
क्या कलयुग आ गया है
हर नेता बोल रहा है
"नोट लो वोट दो"

हर तरफ हुए प्रचलित ये नारे 
अब सब फिरते है बनने को नेता मारे- मारे 

फिर वह हो चाहे शादीशुदा या हो कवारे
या हो लालू या हो भालू
सब बन जाते महान है
क्योकि सबका नारा यही है
"नोट लो वोट दो"

नेता अनपढ़ हो, चोर हो, डाकू हो या हो मवाली
या फिर उनकी ज़बान पर रहती हो गाली
पद पाने की लालसा में हर हद पार कर डाले
दसो गूँडो को प्रचार के लिए पाले
वे भासद दे ऐसा जैसे सच्चे नेता है
पर याद रखे वे सच्चे अभिनेता है
लगे वही करेंगे हमारी और समाज की सेवा
करेंगे जन की भली तरह से सेवा
इसी मे उनके मन को मिलेगा मेवा
पर वे नेता बनाने के बाद
चल दे अपनी शतरंज की चाल
मुकर पीछे हट जाए आपने भाषण  मे दिए वादे से
नकार दे अपनी सारी बात
यह खेल है धन का
क्यूकी हर नेता बोल रहा है
"नोट लो वोट दो"

आज जो दे अच्छा भाषण सो है नेता
अब तो डर है आधी आबादी बन बैठे न नेता
देखो क्यूकी नेता बनना आसान हुआ
बिन कुछ किए ही नेता महान हुआ
तुम जो बैठे इसे पढ़ रहे हो
अब तुम भी राजनीति मे पाव धरो
नेता का पद तुम स्वीकार करो
"नोट लो वोट दो"

Thursday, December 3, 2015

ख़याल


काबू तो शरीर और दिमाग़ पे चलता है
ख़यालो को कैसे मैं बाँध पाती
वो तो आपने में ही दौड़ लगता है

अपने को व्यस्त कर 
जाने मैं किसे छलती थी
मैं तो स्थिर बैठी थी
पर मेरे ख़याल चारों दिशा में दौड़  लगाते थे 
लगता था आँखों ने वो लम्हा क़ैद कर लिया हो
और आज रिप्ले का बटन दबा दिया हो

अब क्या करे, यादों की तार तो दिल से जुड़ी होती है
मैं तो दिल की सुनती थी
पर ये दिल कब किसी की सुनता है

सच है काबू तो दिल और दिमाग़ पे चलता है
तो ख़यालो को कैसे मैं बाँध पाती

Monday, November 30, 2015

मैं और मेरी कलम

मैं ज़रा नाराज़ हूँ
जाने क्यूँ मेरी कलम कुछ लिखने को तैयार नही

शायद मेरी कलम ने मेरी बात मानना छोड़ दिया है

मैं और मेरी कलम घंटो साथ बैठा करते है
पर काग़ज़ तो अब भी कोरा का कोरा है
कोई तो समझाए मेरी कलाम को
ये बेरूख़ी अब नही अच्छी

Tuesday, November 24, 2015

महफूज़



आज आतंक का कोहरा छाया है
हर तरफ दिलो में भड़कती ज्वाला है
जिनमे न वे अपना अस्तित्व बचाते है
परन्तु अन्यों को भी मिटाते है
अब रहा न किसी कोने में कोई महफूज़ |
 
आज आतंक की जड़े चारो ओर सुलगी है
जिसमे पीड़ित हो कई माये अपने बच्चो के लिए रोई है
आँखों में दर्द और डर समाया है
प्रेम का भाव मनुष्य कही दफ़ना आया है
अब रहा न किसी कोने में कोई महफूज़ |
 
हर तरफ लाचारी, बेबसी ने हाथ बढ़ाया है
आतंकवाद ने अपना झंडा फहराया है
हर तरफ आग की लपते है
अब तो पेड़ के तले भी ना छाया है
अब रहा न किसी कोने में कोई महफूज़ |
 
हाय रे, अब भी समय है
इए समस्या से लड़ना होगा
और इस पर विजय पा इसे जड़ करना होगा
अरे! देखो कही देर न हो
यह घुल न जाये पूरे विश्व में विष की तरह
इससे पहले ही कुछ कर गुज़रना होगा
इस आतंकवाद को हमें मिलकर मिटाना होगा
जिसके कारण रहा न किसी कोने में कोई महफूज़ |

Sunday, November 15, 2015

Dance Floor


ना जाने क्या मज़ा है 
Dance Floor की रंग बिरंगी जलती -बुझती लायटो में
लोग एक लय में थिरकने लगे
खुद में मस्त हो कुछ बहकने लगे

DJ ने किया म्यूज़िक लाउड 
हॉल मे अपने आप बढ़ गया क्राउड
कुछ दीवाने अपने हर move पे हो रहे थे proud
तो कुछ यूँ ही झूमते थे, जैसे आसमान मे mad cloud

जहा सब नाचने में है खोए 
वही कुछ चेयर पे बैठे करते अपने head को Shake
इसमे किसी की कोई नही Mistake
ये है Dance Floor
ये नही करता किसी को bore 

Friday, October 16, 2015

नफ़रत की दीवार



एक मेरा सच है
और एक तेरा पक्ष है
नफ़रत की इस दीवार पर साथी एक पैगाम
तू भी लिख
ये बतला, कब लोगो से परे गोलियाँ तेरी दोस्त बन गयी
ये कैसा रोष
हुई तेरी चेतना बेहोश
आँखे मूंदकर बस गोली चला दी 
कभी ये सोचा उसके पीछे भी कोई रोता होगा
किसी की पत्नी को बेवा और
बच्चों को यतीम करते समय
तेरे हाथ कभी नही कापते 
चिखते गिड़गिदते लोगो का ख़ौफ़ देख 
शायद हृदय के किसी कोने मे द्वंद भी तो होता होगा
तेरी जिंदगी के मायने क्या खून ख़राबा है
तो ये जिंदगी, जिंदगी नही छलावा है
दिन भर की दहसदगीर्दी के बाद
रात मे क्या सपने लेकर सोता होगा
नफ़रत की इस दीवार पर साथी
अपना पैगाम तू भी लिख.